Shaam: Ek Drishya
gaharaatee huee shaam hai
aur uchaTe hue man par aboojh-see udaasee.

kachchee see ek saD़k hai,
dhaan kheton se hokar gujaratee huee
door tak chalee jaatee hai —
painaa-saa ek moD़ hai
aur bhaTake huai do vihag.

gaharaatee huee shaam hai,
ghanee pasaree huee ek khaamoshee,
door kaheen bajatee huee bansee ke svar men
aahistaa-aahistaa palaash ke phool
phooT rahe hain ...
aur asankhy taaron ko kataarabaddh
ginate hue baiThe hain ham donon.
- Falguni Roy
Poet's email: [email protected]

प्राप्त: 13 Apr 2018. प्रकाशित: 13 Sep 2018

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This Month

'भावुकता और पवित्रता'
रवीन्द्रनाथ ठाकुर


भाव-रस के लिए हमारे हृदय में एक स्वाभाविक लोभ होता है। काव्य और शिल्पकला से, गल्प, गान और अभिनय से, भाव-रस का उपभोग करने का आयोजन हम करते रहते हैं।

प्राय: उपासना से भी हम भाव-तृप्ति चाहते हैं। कुछ क्षणों के लिए एक विशेष रस का आभोग करके हम यह सोचते हैं कि हमें कुछ लाभ हुआ। धीरे-धीरे इस भोग की आदत एक नशा बन जाती है। मनुष्य अन्यान्य रस-लाभ के लिए जिस तरह विविध प्रकार के आयोजन करता है, लोगों को नियुक्त करता है, रुपया खर्च करता है उसी तरह उपासना-रस के नशे के लिए भी वह तरह-तरह के आयोजन करता है। रसोद्रेक के लिए उचित लोगों का संग्रह करके उचित रूप से वक्तृताओं की व्यवस्था की जाती है। भगवत्प्रेम का रस नियमित रूप से मिलता रहे, इस विचार से तरह-तरह की दुकानें खोली जाती है। ..

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