अप्रतिम कविताएँ
चिट्ठी सी शाम
एक और चिट्ठी सी शाम
डूब गयी सूरज के नाम।

जाड़े की धूप और
कुहरे की भाषा

कोने में टँगी हुई
गहरी अभिलाषा

आसमान के हाथों
चाँदी का गुच्छा

ताल में खिली जैसे
फिर कोई इच्छा

छत से ऊपर उठते
धुएँ के कलाम
- सुरेन्द्र काले
Poet's Address: Nawab Cottage, Purdilpur, Gorakhpur
Ref: Naye Purane, September,1998
विषय:
शाम (11)
उदासी (19)

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इस महीने :
'न्यूज़ चैनल'
प्रियदर्शन


यहाँ त्रासदियाँ
प्रहसन में बदली जाती हैं,
भाषा तमाशे में
और लोग कठपुतलियों में।
तबाहियों की खुराक
इसका पेट भरती है।
बहुत मनोयोग से
किया जाता है
..

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इस महीने :
'राम की जल समाधि'
भारत भूषण


पश्चिम में ढलका सूर्य उठा वंशज सरयू की रेती से,
हारा-हारा, रीता-रीता, निःशब्द धरा, निःशब्द व्योम,
निःशब्द अधर पर रोम-रोम था टेर रहा सीता-सीता।

किसलिए रहे अब ये शरीर, ये अनाथमन किसलिए रहे,
धरती को मैं किसलिए सहूँ, धरती मुझको किसलिए सहे।
तू कहाँ खो गई वैदेही, वैदेही तू खो गई कहाँ,
..

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इस महीने :
'रंग और मैं'
आशा जैसवाल


बड़े निराले होते हैं,
जीवन के ये रंग।
कभी उषा की लालिमा
बन कर मन में
आशाओं के कमल
खिला जाते हैं
तो कभी
निराशा की ... ..

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