अप्रतिम कविताएँ
छिपा लेना
जब वेग पवन का बढ़ जाए
अंचल में दीप छिपा लेना।

कुछ कहते कहते रुक जाना
कुछ आंखों आंखों कह देना
कुछ सुन लेना चुपके चुपके
कुछ चुपके चुपके सह लेना

            रहने देकर मन की मन में
            तुम गीत प्रणय के गा लेना
            जब वेग पवन का बढ़ जाए
            अंचल में दीप छिपा लेना।

नभ में नीरव तारे होंगे
मन में होंगी बातें मन की
कुछ सपने होंगे रंग भरे
कुछ यादें बीते जीवन की

            जब चांद घटा में मुस्काए
            तुम उर की पीर सुला लेना
            जब वेग पवन का बढ़ जाए
            अंचल में दीप छिपा लेना।

कुछ संयम से कुछ निश्चय से
निज यौवन मन छलते जाना
तिल-तिल कण-कण सुरभित करते
कण-कण तिल-तिल जलते जाना

            कुछ सहज नहीं होता है रे!
            प्राणों से नेह निभा लेना
            जब वेग पवन का बढ़ जाए
            अंचल में दीप छिपा लेना।

जब बिखरा दे जागृति-पथ पर
निंदिया निज सपने मृदुदल से
नीरव तारों के दीप सुभग
बुझ चलें उषा के अंचल से,

            शबनम पलकों की ओट लिए
            कलि कुसुमों सम मुस्का देना
            जब वेग पवन का बढ़ जाए
            अंचल में दीप छिपा लेना।
- राम कृष्ण "कौशल"
विषय:
रिश्ते (18)

काव्यालय पर प्रकाशित: 19 Nov 2021

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..

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..

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मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो। मेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

देखिए शिव बहादुर सिंह भदौरिया की कविता "नदी का बहना मुझमें हो" पर विशेष प्रस्तुति
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