अप्रतिम कविताएँ
भोर का पाहुन
भोर का पाहुन दुआरे पर-
भोर वनगंधी हवाओं से किरन के फूल उतरे,
और मेरी देहरी पर कुछ अबोले शब्द बन बिखरे ।
उठो मेरी पद्मगन्धिनि उठो,
चन्दन बांह पर फैले सिवारी आबवाले,
मोरपंखी घन संभालो,
मौन अधरों पर लगी पाबंदियां अपनी उठा लो ।
अभी ठहरा हुआ है भोर का पाहुन दुआरे पर,
अभी ठहरा हुआ है बांसुरी का स्वर किनारे पर ।
उठो इस देहरी के फूल से वेणी संवारूंगा,
अनागत का सजल वरदान पलकों पर उतारूंगा ।
कि कल कोई न यह कह दे-
तुम्हारे द्वार पर उतरा हुआ जो
भोर का पाहुन अनादृत था ।
- रमानाथ शर्मा
Ramanath Sharma
Email: [email protected]
Ramanath Sharma
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विषय:
उषा काल (5)

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मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें होमेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

देखिए शिव बहादुर सिंह भदौरिया की कविता "नदी का बहना मुझमें हो" पर विशेष प्रस्तुति
इस महीने :
'सृष्टि का सार'
अंशु जौहरी


रंगों की मृगतृष्णा कहीं
डरती है कैनवस की उस सादगी से
जिसे आकृति के माध्यम की आवश्यकता नहीं
जो कुछ रचे जाने के लिये
नष्ट होने को है तैयार

स्वीकार्य है उसे मेरी,
काँपती उंगलियों की अस्थिरता
मेरे अपरिपक्व अर्थों की
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'लेखक'
आशीष क़ुरैशी ‘माहिद’


ख़ाली पन्ना किसी खेत-सा
पड़ा रहता है उजाड़।
क़लम की नोक ही बनती है
कुदाल, हँसिया और हल।

हल, जो यादों को कुरेदते हुए
अतीत को खरोंचते हुए

..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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