अप्रतिम कविताएँ
अपराजिता
शांति छिन्न भिन्न हो,
हृदय भले खिन्न हो,
जीवन के अँधेरे-उजास में,
असफल प्रयास में,
आस पराजित नहीं है,
और अपराजिता हूँ मैं |

संबंधों के विच्छेद से,
आस्था के भेद से,
श्वास के विराम से,
अवांछित आयाम से,
स्नेह पराजित नहीं है,
और अपराजिता हूँ मैं |

प्रेम नहीं, द्वेष हो,
विश्व भर में क्लेश हो,
सौभाग्य न हो, अभाग हो,
ध्वनित करुण राग हो,
साहस पराजित नहीं है,
और अपराजिता हूँ मैं |

अग्नि, जल वायु से,
नित बढ़ती आयु से,
पञ्च तत्व भूत से,
आत्मा के सूत्र से,
परिभाषित है मेरा तन,
किन्तु अपरिभाषित रही हूँ मैं -
हाँ, पराजित नहीं हूँ मैं |
- शैली चतुर्वेदी
Shaily Chaturvedi
Email: [email protected]
Shaily Chaturvedi
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विषय:
स्त्री (19)

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इस महीने :
'तू ज़िंदा है'
शैलेंद्र


तू ज़िंदा है तो ज़िंदगी की जीत पे यक़ीन कर
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर।

ये सुबह-ओ-शाम के रँगे हुए गगन को चूमकर
तू सुन ज़मीन गा रही है कब से झूम-झूम कर!

तू आ मेरा सिंगार कर तू आ मुझे हसीन कर।
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें होमेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

देखिए शिव बहादुर सिंह भदौरिया की कविता "नदी का बहना मुझमें हो" पर विशेष प्रस्तुति
इस महीने :
'सृष्टि का सार'
अंशु जौहरी


रंगों की मृगतृष्णा कहीं
डरती है कैनवस की उस सादगी से
जिसे आकृति के माध्यम की आवश्यकता नहीं
जो कुछ रचे जाने के लिये
नष्ट होने को है तैयार

स्वीकार्य है उसे मेरी,
काँपती उंगलियों की अस्थिरता
मेरे अपरिपक्व अर्थों की
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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