अप्रतिम कविताएँ
आसान रास्ते
आसान रास्ते कोई और चुने
उनपर कोई और चले।
मुझे चाहिए वह रास्ता जिसमें
काँटें हों, कंकर और पत्थर हों
जो भयानक जँगलों से गुज़रे -
उस पार कोई ऐसा सूरज है
कोई ऐसी दुनिया है
जो किसी ने नहीं देखी है।
शायद मैं मर जाऊँ,
घायल हो कर गिर जाऊँ।
तो क्या?
- विक्रम मुरारका
Vikram Murarka
Email : [email protected]

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अन्य राशि
राष्ट्र वसन्त
रामदयाल पाण्डेय

पिकी पुकारती रही, पुकारते धरा-गगन;
मगर कहीं रुके नहीं वसन्त के चपल चरण।

असंख्य काँपते नयन लिये विपिन हुआ विकल;
असंख्य बाहु हैं विकल, कि प्राण हैं रहे मचल;
असंख्य कंठ खोलकर 'कुहू कुहू' पुकारती;
वियोगिनी वसन्त की...

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इस महीने :
'सम्पूर्ण यात्रा'
दिविक रमेश


प्यास तो तुम्हीं बुझाओगी नदी
मैं तो सागर हूँ
प्यासा
अथाह।

तुम बहती रहो
मुझ तक आने को।
मैं तुम्हें लूँगा नदी

..

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