तुम
एक ख़्वाब की नदी सी
मुझमें जो बहती हो

अलसाए दिन ढ़ोते हैं
उनींदी रातों को

मैं जानता नहीं ये क्या है
मैं सोचता नहीं ये क्यों है

हर बार तुम्हे मिटाता हूँ
हर बार तुम बन जाती हो

एक ख़्वाब की नदी सी ...
- जितेन्द्र दवे
Jitendra Dave
email: jitdave@rediffmail.com
Jitendra Dave
email: jitdave@rediffmail.com

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इस महीने - काव्यालय की विशेष प्रस्तुति
युद्ध के बाद कृष्ण पर क्या बीत रही होगी - वह सपने में देखती है
तुम्हारे महान बनने में - क्या मेरा कुछ टूट कर बिखर गया है कनु!
कृष्ण द्वारका चले गए हैं - और उनकी प्रिया? उसका संसार?
उस दिन कृष्ण अपनी प्रिया को कितनी देर वंशी से टेरते रहे -