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सूरदास
सूरदास (लगभग 1478–1581) हिंदी साहित्य के 'भक्ति काल' के एक महान संत, कवि और संगीतकार थे। वे महाप्रभु वल्लभाचार्य के शिष्य थे और 'अष्टछाप' के कवियों में उनका स्थान सर्वोपरि है। भगवान कृष्ण के प्रति अटूट प्रेम और समर्पण उनकी कविता का मुख्य आधार है।

विद्वानों में इस बात को लेकर मतभेद है कि वे जन्म से अंधे थे या बाद में हुए, लेकिन उनके द्वारा किया गया प्रकृति और कृष्ण की चेष्टाओं का सूक्ष्म वर्णन किसी को भी चकित कर देता है। उन्होंने कृष्ण के बाल-रूप, उनकी शरारतों और माता यशोदा के प्रेम का ऐसा जीवंत वर्णन किया है कि उन्हें 'वात्सल्य रस' का सम्राट कहा जाता है।

सूरदास जी के योगदान ने ब्रजभाषा को साहित्य की मुख्य भाषा बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी रचनाएँ -

सूरसागर: यह उनकी सबसे प्रसिद्ध और महान रचना है, जिसमें सवा लाख पदों का संग्रह माना जाता है (हालांकि वर्तमान में कम उपलब्ध हैं)।
सूर सारावली: इसमें प्रभु की शक्ति और उनकी महिमा का वर्णन है।
साहित्य लहरी: यह उनकी उत्कृष्ट रचनाओं का अनूठा संग्रह है। [चित्र साभार India Pilgrim Blog]


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