
डॉ. शिव बहादुर सिंह भदौरिया हिंदी साहित्य के सुप्रसिद्ध नवगीतकार, कवि, शिक्षाविद् और समीक्षक हैं। उनका जन्म 15 जुलाई 1927 को उत्तर प्रदेश के रायबरेली जनपद के धन्नीपुर गाँव में हुआ। प्रारंभिक शिक्षा गाँव में प्राप्त करने के बाद उन्होंने उच्च शिक्षा पूरी की और हिंदी साहित्य में गहरी रुचि के कारण शोध कार्य किया। उन्होंने कानपुर विश्वविद्यालय से 'हिंदी उपन्यास : सृजन और प्रक्रिया' विषय पर पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की।
डॉ. भदौरिया ने लंबे समय तक महाविद्यालयों में हिंदी का अध्यापन किया। वे बैसवाड़ा स्नातकोत्तर महाविद्यालय में हिंदी विभागाध्यक्ष रहे तथा बाद में कमला नेहरू स्नातकोत्तर महाविद्यालय के प्राचार्य बने। एक शिक्षक और साहित्यकार के रूप में उन्होंने अनेक विद्यार्थियों और साहित्य प्रेमियों को प्रेरित किया।
डॉ. भदौरिया का नाम हिंदी के नवगीत आंदोलन के प्रमुख कवियों में सम्मानपूर्वक लिया जाता है। उनके गीतों में भारतीय ग्रामीण जीवन, प्रकृति, मानवीय संवेदनाएँ, सामाजिक परिवर्तन और सांस्कृतिक चेतना का सुंदर समन्वय मिलता है। उनकी भाषा सरल, मधुर और प्रभावशाली है, जबकि उनके बिंब और प्रतीक पाठकों के मन पर गहरी छाप छोड़ते हैं। उनके गीतों में लोकजीवन की आत्मीयता के साथ-साथ आधुनिक जीवन की चुनौतियों का भी सजीव चित्रण मिलता है।
उनके प्रमुख काव्य-संग्रहों में 'शिंजनी', 'माध्यम और भी', 'लो इतना जो गाया' तथा 'पुरवा जो डोल गई' उल्लेखनीय हैं। उनकी रचनाएँ अनेक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं तथा नवगीत-संकलनों में प्रकाशित हुई हैं और हिंदी साहित्य के विद्यार्थियों तथा शोधकर्ताओं द्वारा अध्ययन की जाती हैं।
डॉ. शिव बहादुर सिंह भदौरिया का हिंदी साहित्य में विशेष योगदान नवगीत को नई ऊँचाइयाँ प्रदान करने के लिए माना जाता है। उनकी रचनाएँ संवेदना, संगीतात्मकता और सामाजिक सरोकारों का उत्कृष्ट उदाहरण हैं। वे हिंदी कविता की उस परंपरा के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं, जिन्होंने आधुनिक युग में गीत-विधा को नई पहचान और नई ऊर्जा प्रदान की।