समर्पित सत्य समर्पित स्वप्न
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भाग 1 | 39
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मूर्तरूपा – रूप जो साकार हो गया
18. लो तुम्हारे पास आए
मौन एकाकी क्षणों की वेदना मन में छिपाये।
ये भटकते गीत मेरे, लो तुम्हारे पास आये।

नील-नयनी, नव कमलिनी, तुम बहारों की कहानी।
तुम स्वयं साकार कविता, कल्पना मेरी सुहानी।
आज खोलो द्वार, देखो, आ गया मैं बिन बुलाये।
ये भटकते गीत मेरे, लो तुम्हारे पास आये।

तुम सुरूपा, मूर्तरूपा, प्रीति की प्रत्यक्ष प्रतिमा।
आज बिखरा दो क्षितिज पर, सांझ की अनुपम अरुणिमा।
आज हम तुम हाथ थामे, इस सफ़र पर साथ आये।
ये भटकते गीत मेरे, लो तुम्हारे पास आये।

मैं अँधेरों से निकल कर, ढूँढ लाऊँगा उजाले।
मृत्यु पर भी हो विजयिनी, ज्योति यह अमरत्व पा ले।
तुम खड़ी हो राह में, विश्वास के दीपक जलाये।
ये भटकते गीत मेरे, लो तुम्हारे पास आये।

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