समर्पित सत्य समर्पित स्वप्न
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भाग 3 | 69
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इस कविता में दो कवियों की एक एक पंक्ति थोड़े परिवर्तित रूप में उद्धृत हैं।
1. मध्य उत्तर प्रदेश में बीसवीं शताब्दी के आरम्भ या उन्नीसवीं के अंत में एक ग्रामीण कवि थे - भद्री। उनकी एक स्वर्णिम पंक्ति है “सरस्वती के कोष मां कमी काहु की नाहिं; ज्यों बांटे त्यों त्यों बढ़े , बिनु बांटे घट जाहि”।
2. फिल्म बूट पालिश के एक गीत की पंक्ति: “जॉन चचा तुम कितने अच्छे; तुम्हे प्यार करते सब बच्चे” है।
इन पंक्तियों के रचनाकारों को मेरी श्रद्धांजलि।
39. अक्षर नगरी (बाल कविता)
एक थी अक्षर नगरी सुन्दर
उसमें रहते सारे अक्षर।
एक था छोटा बच्चा अ,
उसका भाई बड़क्का आ।
अ की सखी थी छोटी इ।
उसकी बड़ी बहन थी ई।
चारों बच्चे बहुत दोस्त थे;
साथ खेलते और पढ़ते थे।

एक बार वे चारों बच्चे
एक पार्क में खेल रहे थे।
उस दिन उनके उसी पार्क
में चार नए बच्चे आये थे।
उन बच्चों के वेश अलग थे,
मुँह की रंगत कुछ अजीब थी
कोई न जाने कहाँ से आये।
उनकी भाषा भी अजीब थी।

सब बच्चों ने एक सभा की
आपस में मिलकर कुछ सोचा।
गूगल चाचा के घर पहुँचे
उनसे ही जाकर यह पूछा।
चाचा बोले, देखो बच्चों
इस दुनिया में देश बहुत हैं।
इसीलिए इतनी भाषाएं,
भेष बहुत हैं, वेश बहुत हैं।

दुनिया में जितने बच्चे हैं
अलग दिखें, पर इक जैसे हैं।
चोट लगे तो सब रोते हैं,
खुश होने पर सब हँसते हैं
ये बच्चे विदेश से आये,
इनके नाम हैं ए बी सी डी।
इनको अपने नाम बताओ
इनसे कर लो खूब दोस्ती।

ये बच्चे हैं अतिथि तुम्हारे
इनको अपना भोज कराओ।
इनका स्वागत करो प्यार से,
इनसे सीखो, इन्हें सिखाओ।
खाकर देखो केक, पेस्ट्री
इनकी खाओ ऐपल पाई।
इन्हें खिलाओ लड्डू, पेड़ा,
और जलेबी, दूध मलाई।

इनसे सीखो ट्विंकल ट्विंकल
इन्हें सिखाओ चन्दा मामा।
सब में केवल एक भावना
लेकिन सबका अपना गाना।
गूगल चाचा की ये बातें
सब बच्चों ने सोची समझीं।
अ आ इ ई, ए बी सी डी
सब बच्चों में हुई दोस्ती।

गूगल चाचा बहुत जानते
किन्तु नहीं फिर भी अभिमानी।
सबको अपना ज्ञान बाँटते,
इसीलिये तो इतने ज्ञानी।
विद्या, ज्ञान अजब पूँजी है
बाँटो तो यह बढ़ जाती है।
इसको अगर छिपा कर रखो,
ना बाँटो तो घट जाती है।

सब बच्चों ने यह भी समझा
गूगल चाचा सबके चाचा।
वह ज्ञानी हैं, वह विनम्र हैं,
कभी किसी को ग़ैर न समझा।
ज्ञानज्योति से अक्षर नगरी
चमक गयी, बोले सब बच्चे।
गूगल चाचा कितने अच्छे;
उन्हें प्यार करते सब बच्चे।

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