मामला संगीन है
घाटी है... एक औरत

उसी सदियों पुरानी देग में...
ख़ुद के गोश्त को पकाती

कतरा दर कतरा
ख़ुद को ख़ुदी से... करती हलाल

बुर्क़े की आड़ में
दीदार नहीं हो पाते

उस बेज़ान ज़िस्म के
रिसते लोथड़े...
जिन से चूता है लहू
लम्हा दर लम्हा

जुदाई की ज़लालत
इतनी खौफ़नाक है
की
बाँध लेती है... इज़ारबंद
आहिस्ता से...

करवट लेती है
रिसता है थोड़ा लहू

और रँगीन दिखती है
झील
श श्... हौले से

अंदर की बातें
बाहर ना आ जाएं...
उठता है बबाल

एक और मर्द
तैयार है
अपना इज़ारबंद थामे,

चुप हो...
काटने लगती है
ख़ुद का गोश्त
और पकाती है
सालन

किसी ज़लज़ले की ही बिसात है
जो उलट दे
वो देगची...
और बच पाए घाटी
- नीशू पूनिया
देग, देगची - खाना पकाने का गहरा बर्तन; इज़ारबंद - पायजामा का नाड़ा; ज़लज़ला - भूकम्प; बिसात - सामर्थ्य

प्राप्त: 17 Feb 2019. प्रकाशित: 15 Mar 2019

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