मामला संगीन है
घाटी है... एक औरत

उसी सदियों पुरानी देग में...
ख़ुद के गोश्त को पकाती

कतरा दर कतरा
ख़ुद को ख़ुदी से... करती हलाल

बुर्क़े की आड़ में
दीदार नहीं हो पाते

उस बेज़ान ज़िस्म के
रिसते लोथड़े...
जिन से चूता है लहू
लम्हा दर लम्हा

जुदाई की ज़लालत
इतनी खौफ़नाक है
की
बाँध लेती है... इज़ारबंद
आहिस्ता से...

करवट लेती है
रिसता है थोड़ा लहू

और रँगीन दिखती है
झील
श श्... हौले से

अंदर की बातें
बाहर ना आ जाएं...
उठता है बबाल

एक और मर्द
तैयार है
अपना इज़ारबंद थामे,

चुप हो...
काटने लगती है
ख़ुद का गोश्त
और पकाती है
सालन

किसी ज़लज़ले की ही बिसात है
जो उलट दे
वो देगची...
और बच पाए घाटी
- नीशू पूनिया
देग, देगची - खाना पकाने का गहरा बर्तन; इज़ारबंद - पायजामा का नाड़ा; ज़लज़ला - भूकम्प; बिसात - सामर्थ्य

काव्यालय को प्राप्त: 17 Feb 2019. काव्यालय पर प्रकाशित: 15 Mar 2019

***
नीशू पूनिया
की काव्यालय पर अन्य रचनाएँ

 आना
 मामला संगीन है
इस महीने
'चिकने लम्बे केश'
भवानीप्रसाद मिश्र


चिकने लम्बे केश
काली चमकीली आँखें
खिलते हुए फूल के जैसा रंग शरीर का
फूलों ही जैसी सुगन्ध शरीर की
समयों के अन्तराल चीरती हूई
अधीरता इच्छा की
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने
'जबड़े जीभ और दाँत'
भवानीप्रसाद मिश्र


जबड़े जीभ और दाँत दिल छाती और आँत
और हाथ पाँव और अँगुलियाँ और नाक
और आँख और आँख की पुतलियाँ
तुम्हारा सब-कुछ जाँचकर देख लिया गया है
और तुम जँच नहीं रहे हो
लोगों को लगता है
जीवन जितना
नचाना चाहता है तुम्हें
तुम उतने नच नहीं रहे हो

..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने
'कुछ नहीं हिला उस दिन'
भवानीप्रसाद मिश्र


कुछ नहीं हिला उस दिन
न पल न प्रहर न दिन न रात

सब निक्ष्चल खड़े रहे
ताकते हूए अस्पताल के परदे
और दरवाजे और खिड़कीयाँ
और आती-जाती लड़कियाँ
जिन्हे मैं सिस्टर नहीं कहना चाहता था
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
अगली प्रस्तुति
शुक्रवार 24 मई को

सूचना पाने के लिए
ईमेल दर्ज़ करें
संग्रह से कोई भी रचना | काव्य विभाग: शिलाधार युगवाणी नव-कुसुम काव्य-सेतु | प्रतिध्वनि | काव्य लेख
आपकी कविता | सम्पर्क करें | हमारा परिचय

a  MANASKRITI  website