विसंगतियां
जब भी मुझे
जंजीरों का अहसास
कुछ ज्यादा हुआ है
कुछ कर गुज़रने की ललक
मुझमें बढ़ी है
सीमाएं तोड़ जाने की शक्ति
मेरे बंधे हाथों ने दी है
पैरों की बेड़ियों ने
गगनचुम्बी हौसले दिए हैं
सच कहूँ ठोकरों ने मेरी ज़िन्दगी
गतिशील ही की है
जब भी दोस्तों ने मेरे
अस्तित्व को नकारना चाहा
मुझे अपनी ही पहचान मिली है ।
- कान्ता गोगिया
Kanta Gogia
Email: kanta_cis@yahoo.co.in
Kanta Gogia
Email: kanta_cis@yahoo.co.in

***

इस महीने - काव्यालय की विशेष प्रस्तुति
युद्ध के बाद कृष्ण पर क्या बीत रही होगी - वह सपने में देखती है
तुम्हारे महान बनने में - क्या मेरा कुछ टूट कर बिखर गया है कनु!
कृष्ण द्वारका चले गए हैं - और उनकी प्रिया? उसका संसार?
उस दिन कृष्ण अपनी प्रिया को कितनी देर वंशी से टेरते रहे -