माँझी
साँझ की बेला घिरी, माँझी!

अब जलाया दीप होगा रे किसी ने
                           भर नयन में नीर,
और गाया गीत होगा रे किसी ने
                           साध कर मंजीर,
मर्म जीवन का भरे अविरल बुलाता
                           सिंधु सिकता तीर,
स्वप्न की छाया गिरी माँझी!

दिग्वधु-सा ही किया होगा किसी ने
                           कुंकुमी श्रृंगार,
छिलमिलाया सोम-सा होगा किसी का
                           रे रुपहला प्यार,
लौटते रंगीन विहगों की दिशा में
                           मोड़ दो पतवार!
सृष्टि तो माया निरी, माँझी!
- डा. महेन्द्र भटनागर
Dr. Mahendra Bhatnagar
Email : drmahendrabh@rediffmail.com
Dr. Mahendra Bhatnagar
Email : drmahendrabh@rediffmail.com

***
डा. महेन्द्र भटनागर
की काव्यालय पर अन्य रचनाएँ

 भोर का गीत
 एक रात
 कौन तुम
 माँझी

इस महीने - काव्यालय की विशेष प्रस्तुति
युद्ध के बाद कृष्ण पर क्या बीत रही होगी - वह सपने में देखती है
तुम्हारे महान बनने में - क्या मेरा कुछ टूट कर बिखर गया है कनु!
कृष्ण द्वारका चले गए हैं - और उनकी प्रिया? उसका संसार?
उस दिन कृष्ण अपनी प्रिया को कितनी देर वंशी से टेरते रहे -