कौन तुम
कौन तुम अरुणिम उषा-सी मन-गगन पर छा गयी हो!

              लोक धूमिल रँग दिया अनुराग से,
              मौन जीवन भर दिया मधु राग से,
              दे दिया संसार सोने का सहज
              जो मिला करता बड़े ही भाग से,
कौन तुम मधुमास-सी अमराइयाँ महका गयी हो!

             वीथीयँ सूने हृदय की घूम कर,
             नव-किरन-सी डाल बाहें झूम कर,
             स्वप्न-छलना से प्रवंचित प्राण की
             चेतना मेरी जगायी चूम कर,
कौन तुम नभ-अप्सरा-सी इस तरह बहका गयी हो!

             रिक्त उन्मन उर-सरोवर भर दिया
             भावना-संवेदना को स्वर दिया,
             कामनाओं के चमकते नव शिखर
             प्यार मेरा सत्य शिव सुन्दर किया,
कौन तुम अवदात री! इतनी अधिक जो भा गयी हो!
- डा. महेन्द्र भटनागर
Dr. Mahendra Bhatnagar
Email : drmahendrabh@rediffmail.com
Dr. Mahendra Bhatnagar
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शुक्रवार 23 फरवरी को

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