जो हवा में है
जो हवा में है, लहर में है
क्यों नहीं वह बात
        मुझमें है?

शाम कंधों पर लिए अपने
ज़िन्दगी के रू-ब-रू चलना
रोशनी का हमसफ़र होना
उम्र की कन्दील का जलना
आग जो
        जलते सफ़र में है
क्यों नहीं वह बात
        मुझमें है?

रोज़ सूरज की तरह उगना
शिखर पर चढ़ना, उतर जाना
घाटियों में रंग भर जाना
फिर सुरंगों से गुज़र जाना
जो हंसी कच्ची उमर में है
क्यों नहीं वह बात
        मुझमें है?

एक नन्हीं जान चिड़िया का
डाल से उड़कर हवा होना
सात रंगों के लिये दुनिया
वापसी में नींद भर सोना
जो खुला आकाश स्वर में है
क्यों नहीं वह बात
        मुझमें है?
- उमाशंकर तिवारी
Ref: Vagarth, May 1999
Pub: Bharatiya Bhasha Parishad
36A, Shakespeare Sarani, Calcutta

***
इस महीने
'अँधेरे का मुसाफ़िर'
सर्वेश्वरदयाल सकसेना


यह सिमटती साँझ,
यह वीरान जंगल का सिरा,
यह बिखरती रात, यह चारों तरफ सहमी धरा;
उस पहाड़ी पर पहुँचकर रोशनी पथरा गयी,
आख़िरी आवाज़ पंखों की किसी के आ गयी ...
पूरी रचना यहाँ पढें...
इस महीने
'शून्य कर दो'
विनीत मिश्रा


मुझको फिर से शून्य कर दो
तुम्हारे योग से ही तो पूर्ण हुआ था
फिर भूल गया
मेरा अस्तित्व था नगण्य
तुमसे जुड़े बिन
नए अंकों से मिल कर
मैंने मान लिया था स्वयं को
पूर्ण से भी कुछ अधिक ...
पूरी रचना यहाँ पढें...
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शुक्रवार 6 जुलाई को

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