Roshnee
raat, har raat bahut der gae,
teree khiḌakee se, roshanee chhanakar,
mere kamare ke daro-deevaaron par,
jaise dastak see diyaa karatee hai.

main khol detaa hoo(n) chupachaap kivaaḌ,
roshanee pe savaar teree parachhaaee,
mere kamare men utar aatee hai,
so jaatee hai mere saath mere bistar par.
- Madhup Mohta
Madhup Mohta
Email : madhupmohta@hotmail.com

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Madhup Mohta
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 Gaanv
 Roshnee
इस महीने
'अँधेरे का मुसाफ़िर'
सर्वेश्वरदयाल सकसेना


यह सिमटती साँझ,
यह वीरान जंगल का सिरा,
यह बिखरती रात, यह चारों तरफ सहमी धरा;
उस पहाड़ी पर पहुँचकर रोशनी पथरा गयी,
आख़िरी आवाज़ पंखों की किसी के आ गयी ...
पूरी रचना यहाँ पढें...
इस महीने
'शून्य कर दो'
विनीत मिश्रा


मुझको फिर से शून्य कर दो
तुम्हारे योग से ही तो पूर्ण हुआ था
फिर भूल गया
मेरा अस्तित्व था नगण्य
तुमसे जुड़े बिन
नए अंकों से मिल कर
मैंने मान लिया था स्वयं को
पूर्ण से भी कुछ अधिक ...
पूरी रचना यहाँ पढें...
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Friday 6th July

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