अभिसार गा रहा हूँ
ले जाएगा कहाँ तू
मुझसे मुझे चुरा के!

पत्थर के इस नगर में
करबद्ध प्रार्थनाएँ,
इस द्वार सर झुकाएँ,
उस द्वार तड़फड़ाएँ,;
फिर भी न टूटती हैं,
फिर भी न टूटनी है,
चिर मौन की कथाएँ,
चिर मौन की प्रथाएँ,

क्यों टेरता है रह-रह
मुझे बाँसुरी बना के!

उजड़े चतुष्पथों पर
बिखरे हुए मुखौटे,
जो खो गए स्वयं से
औ’ आज तक न लौटे,
उनमें ही मैं भी अपनी
पहचान पा रहा हूँ,
संन्यास के स्वरों में
अभिसार गा रहा हूँ,

क्यों रख रहा है सपने
मेरी आँख में सजा के!
- अमृत खरे
पुस्तक "मयूरपंख: गीत संग्रह (अमृत खरे)" से

प्रकाशित: 3 Dec 2015

***
अमृत खरे
की काव्यालय पर अन्य रचनाएँ

 अभिसार गा रहा हूँ
 पावन कर दो
इस महीने
'तोंद'
प्रदीप शुक्ला


कहते हैं सब लोग तोंद एक रोग बड़ा है
तोंद घटाएँ सभी चलन यह खूब चला है।
पर मानो यदि बात तोंद क्यों करनी कम है
सुख शान्ति सम्मान दायिनी तोंद में दम है।

औरों की क्या कहूं, मैं अपनी बात बताता
बचपन से ही रहा तोंद से सुखमय नाता। ...
पूरी रचना यहाँ पढें...
अगली प्रस्तुति
शुक्रवार 23 फरवरी को

सूचना पाने के लिए
ईमेल दर्ज़ करें